.." ब्लॉगर-टिप्स-एंड-ट्रिक "
कंप्यूटर पर टाइप करना कोई फार्म बनाना अथवा दूसरे शब्दों में कहें तो किसी ऑफिस सॉफ्टवेयर्स चाहे वह माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस हो अथवा ओपन ऑफिस सॉफ्टवेयर हो, उस में हम आप काम नही करते , सारे तकनीकी कार्य तो सोफ्टवेयर स्वयं करता , हम-आप तो मात्र उसमें दी गई सुविधाओं का उपयोग-उपभोग......" ब्लॉगर टिप्स एंड ट्रिक "
अगर मैं यह कहूँ कि '' सिक्ख '' पंथ इस सृष्टि का प्राचीनतम पंथ है तो आप मेरे कथन पर आश्चर्य भी प्रकट करेंगे
प्राचीनतम ''गुरु शिष्य'' परम्परा के क्रम में आज का ''सिक्ख '' पंथ अस्तित्व में आया और गुरु-शिष्य संबंधों को शाश्वत कर गया |
दशम गुरु महाराज गोविन्द सिंह जी द्वारा उसी सिक्ख -पंथ को परमार्जित कर उसी सिक्ख -पंथ के अंतर्गत खालसा-समाज का निर्माण कर सिक्खी को पूर्ण पंथ का दर्जा एवं सम्मान दिला दिया गया । उन्होंने किसी सामाजिक- मान्यता एवं परम्परा एवं समाज के पंथ बनने की प्रमुख शर्तों की पूर्ति करते हुए , अभी तक नानक शाही सिक्ख कहलाने वाले समाज को ''विधान : निशान :कमान : प्रधान : स्थान ''पाँचों लाक्षणिक - प्रमाण { अंग }दे पूर्ण पंथ बना दिया ।
- प्राचीन गुरु-शिष्य परम्परा में बताये गयी हर उस बात को मानना व पालन करना जिनका उपदेश ' गुरु नानक देव जी से लेकर गुरु गोविन्द सिंह जी ' तक दसों गुरु दे गए हैं का अनुपालन करना प्रत्येक सिक्ख का कर्त्तव्य है । पूरे समाज को तीन अंगों में बांटा गया
{1} सिक्ख - संगत :- -उन सभी को कहा गया जो गुरु के सामान्य उपदेशों का पालन करते हुए '' ग्रन्थ साहेब '' को ग्यारहवां एवं अन्तिम गुरु मानने के अतिरिक्त इनके लिए अन्य कोई हार्ड एंड फास्ट नियम नही है जिस कारण से यदि वे ' सनातन-धर्मी नही है , तब भी सिक्ख समाज या संगत में भागीदार हो सकते हैं ,यह उन्हें अपने व्यक्तिगत धर्म के अनुपालन से नही रोकता ।
{2} "खालसा समाज :- को ही सिक्ख समाज : सिक्ख संगत का व्यवस्थापक अधिकार प्राप्त हैं '' इसी खालसा - समाज की स्थापना दसवें गुरु ,गुरु गोविन्द सिंह जी ने की थी । " इस खालसा संगत या समाज के लिए कुछ नियम निर्धारित हैं उनका पालन किया जाना अनिवार्यता है ।
{3} निहंग खालसा :--दसवें गुरु महराज ने अपने उस युग की परम्परा के अनुसार पूरे खालसा संगत के एक अंश को 'धर्म -धार्मिक -भक्तों की रक्षा हेतु नियमित सेना का रूप देकर उन्हें ' ''निहंगसिक्ख '' का नाम दिया ; ये सदैव सैनिक गणवेश में रहते हैं । { उपरोक्त तीनो तथा अन्य तथ्यों का उल्लेख मैं अपने अलग ब्लॉग में विस्तार से करूँगा }
- एक "खालसा "के लिए निर्धारित पञ्च ककार '''केश :कंघ :कड़ा :कच्छ :और :कृपाण '''ही वे प्रतीक - चिन्ह हैं जिन्हें धारण करना हर ''खालसा सिक्ख ''के लिए अनिवार्य होता है । एक पूर्ण सिक्ख गुरुद्वारे में गुरु -ग्रन्थ साहिब जी के समक्ष अमृत पान कर पांचो प्रतीक ककार ग्रहण कर खालसा सजता है । कोई भी सिख उपरोक्त पञ्च ककार धारण करने के लिए स्वतन्त्र तो है , परन्तु जब तक वह ग्रन्थ-साहेब को साक्षी मान पञ्च - प्यारों प्रदत अमृत - पान नही करता वह खालसा कहलाने अधिकारी नही हो सकता । यहाँ तक स्वयं खालसा-पंथ के प्रवर्तक श्री गुरु गोविन्द सिंह जी ने भी नियमों एवं परम्परा का पालन किया '' प्रथम पञ्च -प्यारों को अमृत छकाने के बाद उन्होंने उन उनके हाथ से अमृत -पान खालसा साज सजाया था ।
स्टेम - सेल्स आधार कोशिकाओं अथवा ''स्टेम-सेल्स '' की खोज सम्भवतः इस शताब्दी की उतनी ही महानतम खोज है जितनी विद्युत् -ऊर्जा एवं परमाणु - ऊर्जा की खोजें रही हैं । आशा है कि '' स्टेम-सेल्स '' विज्ञानिकी का अभिर्भाव ,चिकित्सा विज्ञानं की रूप-रेखा अथवा उसे पूर्णतया ही बदल के रख देंगे । इस सब से पहले यह जानना जरुरी है कि स्टेम -सेल्स क्या हैं ? किसी भी पेड़ या पौधे के बीज से सबसे पहले '' तने :: स्टेम { Stem } '' का अभिर्भाव होता है और फ़िर इसी तने [stem ] से पेड़ का अस्तित्व शुरू होता है ; स्टेम { तने } से डालियाँ ,टहनियां ,पत्तियां और फल- फूल तथा बीज उत्पन्न हो कर एक नया पेड़ बनता है ; उसी प्रकार आधार- कोशिकाएं वे कोशिकाएं हैं जिनसे जीवधारियों के शरीर के आतंरिक एवं बाह्य सभी अंगों का निर्माण होता है , इसी कारण से इन्हे " स्टेम - सेल्स { Stem- Cells } " कहा गया है । मूलतः ये जीवधारी के गर्भ में स्थित '' भ्रूणीय - कोशिकाओं " की ' ब्लास्टोसिस ' अवस्था होती है , जो भ्रूणीय -कोशिकाओं के चौथे दिन के बाद से आरंभ हो पांचवे से लेकर सातवें दिन के मध्य होती है । इसी ब्लास्टोसिस अवस्था के कारण इन्हे कोशिकाओं की '' ब्लोस्टोमा '' अवस्था भी कहा जाने लगा है । विस्तार से पढ़ें .... |
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और प्रतीक्षा करें अस्पतालों में ऑपरेशंस के स्थान पर क्षति ग्रस्त अंगों के उगाने के लिए भरती होने का ,तब शायद गरीब मजदूरों की किडनिया धोखे से निकालने का धंधा बंद हो जाए ! पर स्मैकिये खून भी नही बेच पाएंगे । और शायद कोई अनिल कपूर की किडनी बेच कर बहन { किसी उत्पल दत्त की बेटी भी हो सकती है } की शादी करने का महान त्याग-पूर्ण रोल नही कर पाएंगे ? उन गरीबों की बहन-बेटियों का क्या होगा ? क्यों कि निकट भविष्य में मुझे ऐसी सामाजिक क्रांति कि संभावना नही दिखाई देती कि समाज इनका उत्तरदायित्व उठाने लगे गा या समाज में ऐसी परिस्थितियां उतपन्न हो जाएँगी कि धनाभाव में बहन बेटियों की शादियाँ नही रुकेंगी ????????????????!!!!!!!!!!!!!!
| " अमर उजाला दिनांक 18-10-2008::शनिवार <>"चाहत है खिले रूप की::आशिकी करलो धूप की" <> महा नगरों ,बहु-मंजिला इमारतों एसी में रहने वाले वे लोग जो धूप से बचने के बहाने ढूंढा करते है उन्हें सावधान कराती एक शोध परिणामों की एक ख़बर यह भी है ;"विशेष रूप से आज के नौजवानों से ,अपने वर्त्तमान में जितना इसका लाभ उठायेंगें उतना ही बुढापा संवार ले जायेंगे "<> पर साथ साथ अपने ''लक्कड़-चच्चू रहिमन " की बात भी ना भूलियेगा "अति का भला ना,बरसना ;अति की भली ना, धूप " |
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इस ब्लॉग - पोस्ट के बारे में इतना कहना है कि इस में दो कालम होंगे एक ख़बर दार खबरें जो जानकारियाँ इधर उधर से आपके सामने लाई जातीं रहेंगी दूसरे हिस्से में उसके बारे में अभी ना पूछिए || तकनिकी जानकार नही हूँ ,जो कुछ सीख है वह मूलतः "हिन्दी ब्लॉग टिप्स " के गुरु जी आशीष खंडेलवाल जी के सौजन्य से है; इस लिए अभी तो अनगढ़ कालम बनाए है ;समझने की कोशिश कर रहा हूँ कोशिश यही है कि पोस्टिंग फार्म में ही ऐसे दो कालम हो जाए कि इस पोस्ट में तो दो कालम चलते रहे और अन्य में जब चाहूँ पूरा फार्म एकही पेज या कालम का रखूँ और जब चाहूं उसे कई कालमों में बाँट सकूं || पाठक साथियों एवं गुरु जी से सहयोग आपेक्षित है ||
सभी साथियों को ब्लागस्ते |
अन्योनास्ति कबीरा
" कालचक्र" पर सवार " झरोखा "से
| " प्रकृति-चक्र " हमारी भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का जन्म एवं परिपोषण भी मूलतः प्रकृति के सानिध्य में स्वयं प्रकृति द्वारा किया गया था |, आज हम आधुनिकता की दौड में विकास के नाम पर उसी प्रकृति से दूर भाग रहे हैं ,हम यह भूल रहें हैं कि विकास का वास्तविक भावार्थ ' प्रकृति के और निकट जाकर उससे सामंजस्य बैठाते हुए उन्नति करना होता है , इस प्रक्रिया में प्रकृति अपना सर्वश्रेष्ठ उत्पाद जो हमारे जीवन -यापन का मूल आधार है हमें देती है और बदले में हमसे हमारा निकृष्ट - उच्छिष्ट जो सीधे हामारे लिए अनुपयोगी है मांगती है | परन्तु यहाँ एक बन्ध या शर्त भी है , जब हम प्रकृति से उसका सब से उत्कृष्ट लेने के बाद भी उसे प्रसंस्कारित कर के ही उपभोग करते हैं उसे पछोराते, चालते और धोने के अलावा और भी कई प्रक्रियों से गुजरातें है किसी किसी का रूप भी बदलतें हैं , उसके पश्चात उसे आग पर पकाते हैं तब हमारे अनुसार वह हमारे उपभोग के योग्य हो पाता है उसी प्रकार प्रकृति भी चाहती है प्रकृति को हम उसका भोज्य -पदार्थ संस्कारित कर के दें क्यों कि विकास कि उलटी दिशा कि ओर जाने के दौड़ में हमने प्रकृति के प्राकृतिक प्रसंस्कारण एवं शुद्धिकरण उद्योग का विनाश कर डाला है | और यही "प्रकृति के प्रति हमारी कृतज्ञता " होगी |
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