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अगर मैं यह कहूँ कि '' सिक्ख '' पंथ इस सृष्टि का प्राचीनतम पंथ है तो आप मेरे कथन पर आश्चर्य भी प्रकट करेंगे
प्राचीनतम ''गुरु शिष्य'' परम्परा के क्रम में आज का ''सिक्ख '' पंथ अस्तित्व में आया और गुरु-शिष्य संबंधों को शाश्वत कर गया |

  • '' सिक्ख पंथ'' का उद्भव प्रथम गुरु - महाराज '' गुरु नानक देव जी '' [१४६९-१५३९] के
  • जीवन काल में ही होगया था जो अगले आठ गुरुओं के जीवन काल के साथ परवान चढ़ता रहा और नवे बादशाह गुरु तेग बहादुर जी महाराज जी के जीवन काल में इतनी ऊँचाई तक पहुँच गया कि समाज के सताए हुए लोग उनके द्वारे '''त्राहि-माम् ;; त्राहि-माम् ''' करते हुए पहुँचने लगे थे, और उन्हों ने भी शरणागतों को निराश नही किया ; ''' उनकी रक्षा हेतु अपना बलिदान दे ; अपना शीश दे समाज में त्याग और धर्म का मर्म स्थापित किया '''|
  • दशम गुरु महाराज गोविन्द सिंह जी द्वारा उसी सिक्ख -पंथ को परमार्जित कर उसी सिक्ख -पंथ के अंतर्गत खालसा-समाज का निर्माण कर सिक्खी को पूर्ण पंथ का दर्जा एवं सम्मान दिला दिया गयाउन्होंने किसी सामाजिक- मान्यता एवं परम्परा एवं समाज के पंथ बनने की प्रमुख शर्तों की पूर्ति करते हुए , अभी तक नानक शाही सिक्ख कहलाने वाले समाज को ''विधान : निशान :कमान : प्रधान : स्थान ''पाँचों लाक्षणिक - प्रमाण { अंग }दे पूर्ण पंथ बना दिया

    • प्राचीन गुरु-शिष्य परम्परा में बताये गयी हर उस बात को मानना पालन करना जिनका उपदेश ' गुरु नानक देव जी से लेकर गुरु गोविन्द सिंह जी ' तक दसों गुरु दे गए हैं का अनुपालन करना प्रत्येक सिक्ख का कर्त्तव्य है । पूरे समाज को तीन अंगों में बांटा गया

    {1} सिक्ख - संगत :- -उन सभी को कहा गया जो गुरु के सामान्य उपदेशों का पालन करते हुए '' ग्रन्थ साहेब '' को ग्यारहवां एवं अन्तिम गुरु मानने के अतिरिक्त इनके लिए अन्य कोई हार्ड एंड फास्ट नियम नही है जिस कारण से यदि वे ' सनातन-धर्मी नही है , तब भी सिक्ख समाज या संगत में भागीदार हो सकते हैं ,यह उन्हें अपने व्यक्तिगत धर्म के अनुपालन से नही रोकता ।

    {2} "खालसा समाज :- को ही सिक्ख समाज : सिक्ख संगत का व्यवस्थापक अधिकार प्राप्त हैं '' इसी खालसा - समाज की स्थापना दसवें गुरु ,गुरु गोविन्द सिंह जी ने की थी । " इस खालसा संगत या समाज के लिए कुछ नियम निर्धारित हैं उनका पालन किया जाना अनिवार्यता है ।

    {3} निहंग खालसा :--सवें गुरु महराज ने अपने उस युग की परम्परा के अनुसार पूरे खालसा संगत के एक अंश को 'धर्म -धार्मिक -भक्तों की रक्षा हेतु नियमित सेना का रूप देकर उन्हें ' ''निहंगसिक्ख '' का नाम दिया ; ये सदैव सैनिक गणवेश में रहते हैं । { उपरोक्त तीनो तथा अन्य तथ्यों का उल्लेख मैं अपने अलग ब्लॉग में विस्तार से करूँगा }

    • एक "खालसा "के लिए निर्धारित पञ्च ककार '''केश :कंघ :कड़ा :कच्छ :और :कृपाण '''ही वे प्रतीक - चिन्ह हैं जिन्हें धारण करना हर ''खालसा सिक्ख ''के लिए अनिवार्य होता है एक पूर्ण सिक्ख गुरुद्वारे में गुरु -ग्रन्थ साहिब जी के समक्ष अमृत पान कर पांचो प्रतीक ककार ग्रहण कर खालसा सजता है कोई भी सिख उपरोक्त पञ्च ककार धारण करने के लिए स्वतन्त्र तो है , परन्तु जब तक वह ग्रन्थ-साहेब को साक्षी मान पञ्च - प्यारों प्रदत अमृत - पान नही करता वह खालसा कहलाने अधिकारी नही हो सकता । यहाँ तक स्वयं खालसा-पंथ के प्रवर्तक श्री गुरु गोविन्द सिंह जी ने भी नियमों एवं परम्परा का पालन किया '' प्रथम पञ्च -प्यारों को अमृत छकाने के बाद उन्होंने उन उनके हाथ से अमृत -पान खालसा साज सजाया था ।

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    स्टेम - सेल्स

    आधार कोशिकाओं अथवा ''स्टेम-सेल्स '' की खोज सम्भवतः इस शताब्दी की उतनी ही महानतम खोज है जितनी विद्युत् -ऊर्जा एवं परमाणु - ऊर्जा की खोजें रही हैं । आशा है कि '' स्टेम-सेल्स '' विज्ञानिकी का अभिर्भाव ,चिकित्सा विज्ञानं की रूप-रेखा अथवा उसे पूर्णतया ही बदल के रख देंगे । इस सब से पहले यह जानना जरुरी है कि स्टेम -सेल्स क्या हैं ?

    किसी भी पेड़ या पौधे के बीज से सबसे पहले '' तने :: स्टेम { Stem } '' का अभिर्भाव होता है और फ़िर इसी तने [stem ] से पेड़ का अस्तित्व शुरू होता है ; स्टेम { तने } से डालियाँ ,टहनियां ,पत्तियां और फल- फूल तथा बीज उत्पन्न हो कर एक नया पेड़ बनता है ; उसी प्रकार आधार- कोशिकाएं वे कोशिकाएं हैं जिनसे जीवधारियों के शरीर के आतंरिक एवं बाह्य सभी अंगों का निर्माण होता है , इसी कारण से इन्हे " स्टेम - सेल्स { Stem- Cells } " कहा गया है । मूलतः ये जीवधारी के गर्भ में स्थित '' भ्रूणीय - कोशिकाओं " की ' ब्लास्टोसिस ' अवस्था होती है , जो भ्रूणीय -कोशिकाओं के चौथे दिन के बाद से आरंभ हो पांचवे से लेकर सातवें दिन के मध्य होती है । इसी ब्लास्टोसिस अवस्था के कारण इन्हे कोशिकाओं की '' ब्लोस्टोमा '' अवस्था भी कहा जाने लगा है ।
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    और प्रतीक्षा करें अस्पतालों में ऑपरेशंस के स्थान पर क्षति ग्रस्त अंगों के उगाने के लिए भरती होने का ,तब शायद गरीब मजदूरों की किडनिया धोखे से निकालने का धंधा बंद हो जाए ! पर स्मैकिये खून भी नही बेच पाएंगे । और शायद कोई अनिल कपूर की किडनी बेच कर बहन { किसी उत्पल दत्त की बेटी भी हो सकती है } की शादी करने का महान त्याग-पूर्ण रोल नही कर पाएंगे ? उन गरीबों की बहन-बेटियों का क्या होगा ? क्यों कि निकट भविष्य में मुझे ऐसी सामाजिक क्रांति कि संभावना नही दिखाई देती कि समाज इनका उत्तरदायित्व उठाने लगे गा या समाज में ऐसी परिस्थितियां उतपन्न हो जाएँगी कि धनाभाव में बहन बेटियों की शादियाँ नही रुकेंगी ????????????????!!!!!!!!!!!!!!
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    चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी">चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी" title="चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी" खबरदार ख़बर "मैयो इब मैं चंद्र-खिलौनों नाही ................................................................पूरो चन्द्रो लूंगो "
    <> ० श्री हरिकोटा ,अन्तरिक्ष केन्द्र ,आन्ध्र प्रदेश [पूर्वी तट ] भारत वर्ष /
    ० दिन बुद्धवार 22 अक्तूबर 2008 भारतीय समय प्रातः 6 बज कर 22 मिनट ||
    <>० भारत का पहला मानव-रहित " नक्शेबाज " चंद्रयान-प्रथम {मेरे द्वारा नामकरण " पुष्य " } चन्द्रमा के सफर पर रवाना ; अठारह दिनों बाद लक्ष्य पर पहुंचेगा || <> ० चंद्रयान पर लागत लगभग 3.86 अरब रु० से अधिक आई है ० यात्रा अवधि न्यूनतम 18 दिन ;यात्रा की तैयारियों में लगा समय चार वर्ष लगभग ० यात्रा वाहन राकेट पी.एस .एल.वी. 11 पूर्णतः स्वदेशी ० क्रिया-शील आयु , दो वर्षों से अधिक की सम्भावना ० सौर-ऊर्जा से संचालित चंद्रयान का भार 1380 किलोग्राम <> ० चांद्रयान पर पाँच भारतीय ,तीन यूरोपीय ,दो अमेरिकी तथा एक बुल्गारियन कुल ग्यारह [ 11]
    यांत्रिक यात्री सावार [पे-लोड ; वैज्ञानिक उपकरण ]

    ऐ चाँद अब हम आतें हैं

    औरों ने तो बिन्दु छुए
    हम पूरे चाँद पर छाते है ||

    ऐ चाँद अब हम आतें हैं ||
    =================================================================================
    क्यों की पुष्य नक्षत्र में चंद्रयान का प्रक्षेपण हुआ है इसी कारण से पुष्य नामकरण मेरे द्वारा किया गया है ||
    भारत का चन्द्रमा अभियान अन्य देशों से इस अर्थ में अलग होगा कि अन्य देश अभी तक केवल चन्द्रमा के किसी विशिष्ट बिन्दु या क्षेत्र विशेष पर ही अपने को केंद्रित रखते रहे हैं ;जब कि इसरो के अध्यक्ष श्री माधवन नायर के कथनानुसार चंद्रयांन-एक चन्द्रमा के पूरे धरातल का चित्र \\ नक्शा बनाएगा [इसी कारण से मैंने शुरू में ही इसे " नक्शेबाज़ " कहा है ] इस आभियान की सफलता अन्तरराष्ट्रीय विश्व में भारत की प्रतिष्ठा को बाहुत ज्यादा बढ़ा देगी ||
    खबर="पुछल्ला "===> माहोली के के मैदान में भारतीय 'टाईगर्स ' ने ' कंगारुओं ' को धराशायी करते हुए झिंझोड़ कर रख दिया || आर्थिक ' रिंग ' से>>>>>
    ० करें जतन कोई , रेल माल ढुलाई को मन्दी मार लगा गयी \\
    ० सोना सो गया ,चांदी चक्करा गयी मन्दी मार लगा गयी \\
    ० पी. एफ. का पैसा लगेगा बाज़ार में मन्दी मार लगा गयी \\
    ० अभी मोटापा ना आयेगा तेल की धार में मन्दी मार लगा गयी \\
    ० काम ना आया ' रेपो-रेट ' सेंसेक्स उल्टी गुलाटी खा गयी मन्दी मार लगा गयी \\
    ० बैठिये महिन्द्रा की हाईब्रिड स्कार्पियो कार में मंदी मार ...........?????
    राजनीति के मैदान से ::=== >० संसद में विपक्ष के नेता श्री लाल कृष्ण अडवानी ने सभी भाजपाई सांसदों निर्देशित किया कि वे पाँच राज्यों के विधान सभा चुनावों में जुटें | जिनके राज्यों में चुनाव हो रहे हैं वे तो अपने अपने राज्यों में लगेगें ही ,और जिन राज्यों में चुनाव नही होरहे हैं वे भी इसे आगामी लोक-सभा चुनावों का पूर्वाभ्यास मान कर इसमें जुट जाएँ |
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    द्वितीय प्रवाह
    चंद्र यान -१ की कक्षा में पहला संशोधन बृहस्पति 23 अक्टोबर 2008 को किया गया | 440 न्यूटन द्रव्य इंजन को 18 मिनट चला कर चंद्रक की पृथ्वी की कक्षा के दूरस्थ बिन्दु [अपोजी ] को उड़ान के बाद की आरंभिक स्थिति 22860 किलो मीटर से बदल कर 37900 किलो मीटर तथा कक्षा के निकटतम बिन्दु [ पेरिजी] को बदल कर 225 से 305 किलो मीटर कर दिया गया | पहली कक्षा में चंद्रक [चंद्र यान - ] को पृथ्वी की परिक्रमा कराने में जहाँ लगभग सादे छः घंटे लगा रहे थे ,वहीं अब लगभग 11 घंटों का समय लगेगा || आने वाले दिनों में जैसे जैसे चन्द्रक ,चन्द्रमा की ओर बढ़ता जाएगा इसकी कक्षा एवं गति में आवश्यकता के अनुसार परिवर्तन किये जाते रहेंगे ,यान में लगे सभी व्यवस्थाएं एवं यंत्र सही ढंग से कार्य कर रहे हैं || ****************-----------------------------------------------*********-----------------------------------------************** चंद्रक यान के पीछे की जोरदार खबरें >>>>>> देश प्रेम के महान उदाहरण के रूप में इस चंद्र यान मिशन से जुड़े वैज्ञानिकों के "जज्बे को सलाम'" === इस योजनासे जुड़े के कई वैज्ञानिकों ने "कुछ हजार की सरकारी नौकरी " करते हुए राष्ट्र के गौरव इस मिशन से जुड़े रहने को अपना धर्म समझ ते हुए , इस बीच अपने सामने आए ५०-५० :: १००-१०० गुना अधिक वेतन के विदेशियों द्वारा कई -कई बार दिए गए प्रस्तावों को ठुकरा दिया | [सौजन्य से :- अमरउजाला दैनिक ,इलाहाबाद ] अगर हम भारत के अन्तरिक्ष-यान शोध ,विशेष रूप से चंद्र -यान- मिशन की तुलना नासा ,रुसी , यूरोपीय ,चीन आदि के अभियानों से करते हैं तो पाते हैं कि जहाँ उनके अभियान पर खरबों डालर व्यय हुए हैं ,वहीं भारत ने मात्र दो जेट विमानों की कीमत जो लगभग पौने चार अरब रूपये होंगे ; में अपना चंद्र यान चन्द्रमा की ओर रवाना कर दिया जिसके अभी तक के सभी चरण योजनानुसार सफल रहे हैं | यह अब तक का सबसे सस्ता अन्तरिक्ष मिशन माना जा रहा है ,भारत ने भी पहली बार पृथ्वी की कक्षा से से बाहर निकल कर दूर अंतरिक्ष में किसी अन्य ग्रह की कक्षा में [चन्द्रमा को उपग्रह माना जाता है ] अपने उपग्रह-यान को स्थापित कराने का प्रयत्न किया है \\ यह भारत के वैज्ञानिकों की योग्यता के प्रति विश्वास की पराकाष्ठा ही है कि भारत का अनजाने खतरों से भरा पहला सबसे लम्बा - अंतरिक्ष अभियान फ़िर भी चंद्र यान में यूरोप के तीन ,अमेरिका के दो बुलगारिया के एक यानी छः , भारत के पाँच को छोड़ कर अर्थात कुल ११ यांत्रिक यात्री चंद्रक पर सवार हैं | खर्च बचाने के लिए भारत ने बड़े खिलाड़ियों द्वारा पुरानी घोषित कि जा चुकी स्पिन लैंडिंग प्रणाली का उपयोग इसमे किया है |
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    " रूप और धूप "
    अमर उजाला दिनांक 18-10-2008::शनिवार
    <>"चाहत है खिले रूप की::आशिकी करलो धूप की" <>
    महा
    नगरों ,बहु-मंजिला इमारतों एसी में रहने वाले वे लोग जो धूप से बचने के बहाने ढूंढा करते है उन्हें सावधान कराती एक शोध परिणामों की एक ख़बर यह भी है ;"विशेष रूप से आज के नौजवानों से ,अपने वर्त्तमान में जितना इसका लाभ उठायेंगें उतना ही बुढापा संवार ले जायेंगे "<>
    पर साथ साथ अपने ''लक्कड़-चच्चू रहिमन " की बात भी ना भूलियेगा
    "अति का भला ना,बरसना ;अति की भली ना, धूप "

    • <>स्वास्थ्य सम्हालने के लिए धूप में सैर करें, अगर धूप से भाग रहें हैं, तो शरीर का और बिगड़ा रूप देखने को तैयार रहें,
    • <> पराबैगनी किरणों के संपर्क में आने पर ही शरीर में ' विटामिन डी ' बनता है; भोजन से इसकी पूर्ति नही की जा सकती,
    • <> शरीर में विटामिन 'डी' कमी की होने पर, कैलशियम युक्त भोजन लेने पर भी शरीर को उस का लाभ नही,
    • <>:कैल्शियम के अपर्याप्त अवशोषण से हड्डियां कमजोर हो जाती है , उनका घनत्व कम हो कर 'आस्टियोपोरोसिस ' की प्रबल संभावना,
    • <> ' आस्टियोपोरोसिस' में हल्का सा झटका भी शरीर को बड़ी हानि पहुंचा सकता है, पैर कमर की हड्डियों को सर्वाधिक हानि होती है ,
    • <>सूरज की धूप में " 7 डीहाईड्रोकोलेस्ट्राल " नामक केमिकल होता है , जो पराबैगनी किरणों के पड़ने से विटामिन 'डी'में बदल जाता है

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    इस ब्लॉग - पोस्ट के बारे में इतना कहना है कि इस में दो कालम होंगे एक ख़बर दार खबरें जो जानकारियाँ इधर उधर से आपके सामने लाई जातीं रहेंगी दूसरे हिस्से में उसके बारे में अभी ना पूछिए || तकनिकी जानकार नही हूँ ,जो कुछ सीख है वह मूलतः "हिन्दी ब्लॉग टिप्स " के गुरु जी आशीष खंडेलवाल जी के सौजन्य से है; इस लिए अभी तो अनगढ़ कालम बनाए है ;समझने की कोशिश कर रहा हूँ कोशिश यही है कि पोस्टिंग फार्म में ही ऐसे दो कालम हो जाए कि इस पोस्ट में तो दो कालम चलते रहे और अन्य में जब चाहूँ पूरा फार्म एकही पेज या कालम का रखूँ और जब चाहूं उसे कई कालमों में बाँट सकूं || पाठक साथियों एवं गुरु जी से सहयोग आपेक्षित है ||
    सभी साथियों को ब्लागस्ते |
    अन्योनास्ति कबीरा
    " कालचक्र" पर सवार " झरोखा "से
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    " प्रकृति-चक्र "
    हमारी भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का जन्म एवं परिपोषण भी मूलतः प्रकृति के सानिध्य में स्वयं प्रकृति द्वारा किया गया था |, आज हम आधुनिकता की दौड में विकास के नाम पर उसी प्रकृति से दूर भाग रहे हैं ,हम यह भूल रहें हैं कि विकास का वास्तविक भावार्थ ' प्रकृति के और निकट जाकर उससे सामंजस्य बैठाते हुए उन्नति करना होता है , इस प्रक्रिया में प्रकृति अपना सर्वश्रेष्ठ उत्पाद जो हमारे जीवन -यापन का मूल आधार है हमें देती है और बदले में हमसे हमारा निकृष्ट - उच्छिष्ट जो सीधे हामारे लिए अनुपयोगी है मांगती है | परन्तु यहाँ एक बन्ध या शर्त भी है , जब हम प्रकृति से उसका सब से उत्कृष्ट लेने के बाद भी उसे प्रसंस्कारित कर के ही उपभोग करते हैं उसे पछोराते, चालते और धोने के अलावा और भी कई प्रक्रियों से गुजरातें है किसी किसी का रूप भी बदलतें हैं , उसके पश्चात उसे आग पर पकाते हैं तब हमारे अनुसार वह हमारे उपभोग के योग्य हो पाता है उसी प्रकार प्रकृति भी चाहती है प्रकृति को हम उसका भोज्य -पदार्थ संस्कारित कर के दें क्यों कि विकास कि उलटी दिशा कि ओर जाने के दौड़ में हमने प्रकृति के प्राकृतिक प्रसंस्कारण एवं शुद्धिकरण उद्योग का विनाश कर डाला है |

    और यही "प्रकृति के प्रति हमारी कृतज्ञता " होगी

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     hamaraa honaa  naa  honn  barabar hai 
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